कुछ रिश्ते होते कितने खास|

एक माँ जो बहुत आहत है उसके बेटे की कुछ बातों से।
पर फिर भी वो अपने बेटे के जन्मदिन पे शब्दों से पिरोया एक तोहफा देती है जो ना कभी पुराना होगा। ना कभी मैला।
बहुत खूबसूरती से रिश्तों को और ख़ास बनाते हुए एक माँ कुछ इस तरह से लिखती है 📝📝

तुमसे ही पाया यह एहसास
कुछ रिश्ते होते कितने खास |

तुमसे कितनी नाराज़ रहूँ,
दिल में कितने भी राज़ रखूं,
पर दूर करूँ तुमको खुद से,
नहीं कोई बहाना मेरे पास,
कुछ रिश्ते होते इतने खास |

इन नाज़ुक-भावुक रिश्तों में
कुछ बढ़ती-घटती किश्तों में
तुमने जो गहरी नींव रखी,
माँ कह, जगाई थी एक आस,
कुछ रिश्ते होते इतने खास |

कुछ उन्नींदें से सपने थे,
तुम कोई नहीं, पर अपने थे,
अपनाकर भी अपना न सकूँ,
नहीं खुद पर अब इतना विश्वास,
कुछ रिश्ते होते इतने खास |

उन गहरी, सोती रातों में
उन कही-अनकही बातों में,
कुछ सपने तुमने बांटे थे,
मुश्किल तो थे, पर थी मिठास
कुछ रिश्ते होते इतने खास |

यह सालगिरह का है अवसर,
मैं वही कहूँ, जो कहती अक्सर
मेरी हंसी का दूजा नाम है जो,
मेरी दुआ हो उसके आस-पास,
कुछ रिश्ते होते इतने खास |

बेटा माँ की ही पक्तियों में ही कुछ पक्तियां जोड़ते हुए अपना आभार व्यक्त करता है। 📝📝

जीवन कुछ यूँ आवारा था।
तुमने हाथ पकड़ संवारा था।
चहु और अँधियारा था।
तुम मिले तो हुआ प्रकाश।
कुछ रिश्ते होते इतने ख़ास।

दुःखों की चादर से लिपटी सी।
मेरे ज़िन्दगी मुट्ठी में सिमटी सी।
माँ बस इतनी है विनती सी।
दे दो जगह चरणों के पास।
कुछ रिश्ते होते इतने ख़ास।

माँ तू ज्ञान की ज़्योति है।
मेरी आँखों का मोती है।
तू रोये तो रूह रोती है।
तेरी हँसी से मिले उल्लास।
कुछ रिश्ते होते इतने ख़ास।

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