इक मुलाक़ात

वक़्त ने दूर किया, वक़्त ने ही मिलाया।
वो सामने थी मेरे जिसका ढूंढता था साया।

दूर घर से किसी भीड़ में थी वो।
अकेलेपन की किसी पीड़ में थी वो।

किसी रोज मिलता था इक हक़ से इक नाज से।
किस रिश्ते से चलूँ मैं पूछ रहा आज से।

ले के गुलाब इक, बढ़ चला मैं उसकी ओर।
गेरुए से लब उसके, करने लगे फिर कुछ शोर।

रुक गया था मैं और रुक गया मेरा हर पल।
जो दूरियां थी अब। ख़त्म की उसने खुद चल।

आँखों में था प्यार। लब पे थी शिकायत।
कुछ बातें थी दिल में। जो कर रही थी आहत।

सब अनकही शिकायत पल में सिमट गई।
कोई महकती सी हवा हमसे लिपट गई।

नहीं मालूम मैं कौन सा रिश्ता जोड़ आया हूँ।
आज़ाद हूँ या इश्क़ की चादर ओढ़ आया हूँ।

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